फिल्म समीक्षा: उबाऊ 'दस कहानियां'

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08 दिसम्बर 2007
आवाज ई-गाइड
राजीव मसंद
निर्देशक: संजय गुप्ता, अपूर्व लाखिया, हंसल मेहता, जस्मीत धोड़ी, मेघना गुलजार, रोहित रॉय।
मुख्य कलाकार: संजय दत्त, शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, मनोज वाजपेयी, अरबाज खान, डीनो मोरिया और नेहा धूपिया, जिमी शेरगिल आदि।
फिल्म ‘दस कहानियां’ की सबसे बड़ी कमी है कि इसकी कहानियां किसी एक डोर में नहीं बंधी है। बल्कि हर कहानी अलग है। आप कहेंगे कि कहानियों का अलग होना क्या खराबी है? कहानियों को सिर्फ मजेदार होना चाहिए। लेकिन यही है इन कहानियों की कमी। कुछ कहानियों को छोड़ बाकी सब प्रेडिक्टेबल और उबाऊ है।
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‘मैट्रिमनी’ जिसे निर्देशित किया है संजय गुप्ता ने, अरबाज खान और मंदिरा बेदी की शादीशुदा जोड़ी को दिखाती है। ये भरोसे और धोखे पर आधारित एक बढ़िया कहानी है। यह एक सर्प्राइज के साथ खत्म होती है जो काफी दिलचस्प है।
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मेघना गुलजार की ‘पूरनमासी’ मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई। ये मां-बेटी बनी अमृता सिंह और मीनिषा लांबा के बिना शर्त के प्यार को दिखाती है।
उधर संजय गुप्ता की मनोज बाजपेयी और दिया मिर्जा अभिनीत ‘जाहिर’ इसलिए काम कर जाती है क्योंकि इसका अंत काफी सदमे भरा है। अब दस में से सिर्फ तीन अच्छी कहानियां कोई बहुत अच्छे नम्बर नहीं कहे जा सकते। बल्कि सच पूछिए तो यह आपको बांधने के लिए काफी नहीं है।
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अब मैं ‘दस कहानियां’ को एक दिलचस्प प्रयोग कहूंगा जो आपको ज्यादातर बोर ही करता है। मैं फिल्म ‘दस कहानियां’ को पांच में से सिर्फ एक अंक दूंगा।
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